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परिचय

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पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) स्थायी विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों के इष्टतम उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण प्रबंधकीय तकनीक है । हमारे देश में 1978-79 में नदी घाटी परियोजनाओं के प्रभावपूर्ण मूल्यांकन के साथ इस दिशा में शुरूआत की गई थी और तत्पश्चात् अन्य विकासात्मक क्षेत्रों, जैसे उद्योग, ताप विद्युत परियोजना, खनन स्कीम इत्यादि को शामिल करने के लिए कार्यक्षेत्र का विस्तार किया गया । पर्यावरण संबंधी आंकड़े एकत्रित करने और प्रबंधन की योजनाएं तैयार करने की सुविधा प्रदान करने के लिए, दिशानिर्देश तैयार किए गए और उन्हें संबंधित केंद्र एवं राज्य शासन के विभागों में परिचालित किया गया । ईआईए को अब पर्यावरण (संरक्षण अधिनियम,1986 के अंतर्गत विकासात्मक गतिविधियों की उन 29 श्रेणियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है, जिनमें रु. 50 करोड़ या इससे अधिक का निवेश शामिल हो ।

 

पर्यावरणीय मूल्यांकन समितियां

 

विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय मूल्यांकन के लिए आवश्यक बहु-अनुशासनात्मक इनपुट सुनिश्चित करने की दृष्टि से, निम्नलिखित क्षेत्रों के लिए विशेषज्ञ समितियों का गठन किया गया है:-

  • खनन परियोजनाएं
  • औद्योगिक परियोजनाएं
  • ताप विद्युत परियोजनाएं
  • नदी घाटी, बहुउद्देशीय, सिंचाई एवं पन बिजली परियोजनाएं
  • अवसंरचना विकास एवं विविध परियोजनाएं
  • परमाणु विद्युत परियोजनाएं 

 

पर्यावरणीय मूल्यांकन की प्रक्रिया

 

किसी परियोजना प्राधिकारी द्वारा ईआईए में निर्दिष्ट सभी आवश्यक दस्तावेज़ों के साथ आवेदन प्रस्तुत कर देने के बाद, इसे पर्यावरणीय मूल्यांकन समितियों के समक्ष रखने से पहले तकनीकी कर्मचारियों द्वारा इसकी जांच की जाती है । मूल्यांकन समितियां परियोजना प्राधिकारियों द्वारा प्रस्तुत आंकड़े के आधार पर परियोजना के प्रभाव का मूल्यांकन करते हैं और यदि आवश्यक हो, तो स्थल निरीक्षण या विविध पर्यावरण पहलूओं का कार्यस्थल पर मूल्यांकन करने का कार्य भी किया जाता है। ऐसे परीक्षण के आधार पर, समितियां परियोजना की स्वीकृति या अस्वीकृति के लिए अनुशंसाएं करती हैं, जिन पर स्वीकृति या अस्वीकृति के लिए मंत्रालय में कार्रवाही की जाती है । खनन, नदी घाटी, बंदरगाहों एवं पोतगृहों इत्यादि जैसी स्थल विशिष्ट परियोजनाओं के मामले में, दो चरणों की स्वीकृति प्रक्रिया अपनाई गई है, जिसके द्वारा परियोजना प्राधिकारियों को पर्यावरण स्वीकृति हेतु आवेदन करने से पहले स्थल स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होता है । ऐसा उन क्षेत्रों से बचना सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है, जो पारिस्थितिकीय रूप से कमज़ोर एवं पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील हैं । ऐसी परियोजनाओं के मामले में जहां संपूर्ण जानकारी प्रस्तुत कर द गई है, उन पर 90 दिनों के अंदर निर्णय कर लिया जाता है । 

 

निगरानी

 

किसी परियोजना के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद, निर्धारित पर्यावरण सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन के अधीन पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान कर दी जाती है । स्वीकृत परियोजनाओं की निगरानी शिलाँग, भुवनेश्वर, चंडीगढ़, बैंगलोर, लखनऊ एवं भोपाल स्थित मंत्रालय के छ: क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा की जाती है। ऐसी प्रक्रिया का प्राथमिक उद्देश्य सुझाए गए सुरक्षा उपायों की पर्याप्तता सुनिश्चित करने के साथ ही आवश्यकता पड़ने पर मध्य-अवधि सुधार करना भी होता है । निगरानी के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया इस प्रकार है:-

  • परियोजना प्राधिकारियों को प्रत्येक छ: महीने में निर्धारित शर्तें / सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन की प्रगति पर प्रतिवेदन देना होता है, जो यद्यपि परियोजना की स्वीकृति के अनुसार होता है ।
  • विकास परियोजनाओं का निष्पादन डेटा एकत्रित करने और उसका विश्लेषण करने के लिए मंत्रालय और/ या उसके क्षेत्रीय कार्यालय के अधिकारियों एवं विशेषज्ञ दलों द्वारा स्थल भ्रमण भी किया जाता है, ताकि सामने आई कठिनाईयों का समाधान ढूंढने के लिए प्रस्तावकों के साथ चर्चा की जाए। 
  • महत्वपूर्ण विचलन अथवा कमज़ोर या कोई उत्तर न मिलने की स्थिति में, मामले को संबंधित राज्य सरकार के समक्ष ले जाया जाता है। 
  • यह जांचने के लिए कि पूर्व र्निणय की समीक्षा आवश्यक है या नहीं, परियोजना के कार्यक्षेत्र में परिवर्तनों की पहचान की जाती है । 

 

तटीय क्षेत्र प्रबंधन

 

तटीय राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरझेड) अधिसूचना 1991 के प्रावधानों के अनुसार तटीय क्षेत्र प्रबंधन तैयार करना होता है, विभिन्न गतिविधियों के तटीय क्षेत्रों की पहचान और वर्गीकरण करना और उसे स्वीकृति हेतु मंत्रालय के पास प्रस्तुत करना होता है ।

मंत्रालय ने महाराष्ट्र एवं गुजरात सरकार द्वारा जमा की गई इन योजनाओं के परीक्षण के लिए कार्य बल का गठन किया है जिन पर कार्य बल की बैठकों में चर्चा की गई है और इन्हें संशोधित किए जाने की आवश्यकता है । उड़ीसा सरकार ने अपने तटीय क्षेत्र के केवल एक भाग को शामिल करने वाली आंशिक योजना जमा की है । पश्चिम बंगाल के संबंध में, सीजेडएमपी का एक प्राथमिक अवधारणा दस्तावेज़ जमा किया गया है। गोआ प्रदेश एवं दमन एवं द्वीप, लक्षद्वीप एवं अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की केंद्रशासित सरकारों की ओर से संशोधित सीजेडएमपी /स्पष्टीकरण प्राप्त हो गए हैं।

वर्ष के दौरान, कार्य बल ने योजनाओं पर विचार करने के लिए सात बैठकें और दो स्थल भ्रमण किए हैं। विभिन्न राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की योजनाओं को अंतिम रूप दिए जाने के बाद, तटीय बेल्ट में विकास गतिविधियों को अधिक सशक्त रूप से विनियमित किया जाएगा ताकि सीआरजेड अधिसूचना का उल्लंघन न होना सुनिश्चित किया जा सके।

 

द्वीप विकास प्राधिकरण (आईडीए)

 

पर्यावरण संरक्षण के प्रासंगिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, द्वीपों के एकीकृत विकास पर लक्षित नीतियों एवं कार्यक्रमों पर निर्णय लेने के साथ ही, विकास के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और उनके प्रभाव की समीक्षा करने के लिए, आईडीए की 9वीं बैठक प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 22.1.1996 को आयोजित हुई ।

 

वहन क्षमता पर अध्ययन

 

प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और तेज़ गति से घटते जा रहे हैं इसलिए स्थायी विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अनुकूलन, स्वत: सिद्ध है, जिसे केवल तभी किया जा सकता है जबकि पर्यावरणीय मान्यताओं को विकास की प्रक्रिया में भली-भांति मिला लिया जाए। अक्सर ऐसा देखा गया है कि किसी विशिष्ट क्षेत्र के एक या अधिक प्राकृतिक संसाधन सीमित हो गया(गए) हैं जिसके कारण विकास का कार्यक्षेत्र प्रतिबंधित हो जाता है । पर्यावरण एवं वन मंत्रालय विभिन्न क्षेत्रों के लिए क्षमता अध्ययन प्रायोजित करता रहा है । इन अध्ययनों में निम्नलिखित बातें शामिल हैं:-

  • उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को सूचीबद्ध करना;
  • मौजूदा पर्यावरण सेटिंग की तैयारी;
  • परिप्रेक्ष्य योजनाएं और "सामान्य रूप से व्यापार परिदृश्य" निर्माण के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों पर उनका प्रभाव;
  • वायु, जल या भूमि प्रदूषण से निपटने के लिए तत्काल उपचारात्मक कार्यवाही की आवश्यकता वाले "हॉट स्पॉट " की पहचान करना;
  • पसंदीदा परिदृश्यों सहित वैकल्पिक विकास परिदृश्यों का निरूपण. स्थानीय लोगों के साथ ही योजनाकारों के साथ पैकेज की चर्चा करने के बाद, "सामान्य रूप से व्यापार " एवं "पसंदीदा परिदृश्य " के बीच तुलना करने से क्षेत्र के विकास के लिए अपनाई जाने वाली भविष्य की कार्यवाही का संकेत मिलेगा ।

 

कुछ समस्याग्रस्त क्षेत्रों जैसे दून घाटी – जो पारिस्थितिकीय रूप से एक संवेदनशील क्षेत्र है, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) जो वायु एवं जल प्रदूषण के साथ ही अधिक भीड़ से भी जूझ रहा है, दामोदर नदी घाटी जो कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है और जहां व्यापक पर्यावरण क्षरण भी हुआ है और तापीय खाड़ी, जो जल एवं भूमि विकास की तटीय क्षेत्र की समस्याओं का प्रतिनिधित्व करती है, का चयन ऐसे अध्ययन करने के लिए किया गया है । ऐसे अध्ययन आयोजित करने के लिए एक बहु-अनुशासनात्मक एवं बहु-संस्थागत दृष्टिकोण अपनाया गया है । दून घाटी और एनसीआर के मसौदा प्रतिवेदन तैयार हो गए हैं और उसे अंतिम रूप देने के लिए एनजीओ तथा स्थानीय लोगों से उसकी चर्चा की जा रही है । दामोदर घाटी तथा तापी की खाड़ी से संबंधित कार्य कम महत्वपूर्ण डेटा एकत्रीकरण और विश्लेषण के साथ जारी है ताकि प्राथमिक डेटा एकत्रीकरण तथा विकास परिदृश्यों में संशोधन की आवश्यकताओं की पहचान की जा सके ।